Pocket Option डिपॉज़िट मेथड और UPI: 2026 भारत गाइड

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Pocket Option डिपॉज़िट मेथड और UPI: 2026 भारत गाइड

भारत में फ़ंडिंग विकल्प

भारतीय पाठक जिन श्रेणियों से टकराते हैं वे चार-पाँच ही हैं, और हर एक का बर्ताव अलग है। किसी एक को "उपलब्ध" मान लेना ही सबसे आम ग़लती है।

पहले एक बात साफ़ कर लेना ज़रूरी है, क्योंकि इसी पर पूरा पन्ना टिका है। यह एक ऑफशोर मंच है और भारतीय बैंक, कार्ड जारीकर्ता तथा भुगतान सेवा प्रदाता विदेशी ट्रेडिंग मर्चेंट से जुड़े लेन-देन को अक्सर अस्वीकार या वापस कर देते हैं। इसलिए किसी भी श्रेणी के बारे में यह कहना कि वह "काम करती है" ग़लत होगा। जो सूची आपके अकाउंट की कैशियर स्क्रीन पर उस क्षण खुलती है, वही आपके लिए असली सूची है।

इसका एक और नतीजा है जिसे शुरू में ही मान लेना बेहतर होता है: यह सूची स्थायी नहीं है। जो विकल्प पिछले महीने खुला था वह इस महीने ग़ायब हो सकता है, और ज़रूरी नहीं कि इसमें मंच की कोई भूमिका हो — बीच का प्रोसेसर बदलने भर से तस्वीर बदल जाती है। इसलिए योजना ऐसी बनाइए जो किसी एक तरीक़े पर पूरी तरह टिकी न हो।

घरेलू रेल का संदर्भ। भारत में रोज़मर्रा का भुगतान बड़े पैमाने पर तुरंत-भुगतान रेल और वॉलेट ऐप्स से चलता है, इसलिए पाठक स्वाभाविक रूप से उन्हीं के नाम से खोजते हैं। सीमा-पार लेन-देन में तस्वीर बदल जाती है: घरेलू रेल घरेलू लेन-देन के लिए बनी हैं, और विदेशी व्यापारी तक पहुँचने पर बीच में कोई न कोई मध्यस्थ या भुगतान प्रोसेसर आता है। यही परत तय करती है कि कोई विकल्प उस दिन दिखेगा या नहीं।

बैंक ट्रांसफ़र। सीधा बैंक ट्रांसफ़र सबसे पारंपरिक रास्ता है और उसका फ़ायदा यह है कि पैसा उसी खाते से जाता है जो आपके नाम पर है — यानी बाद में तरीक़ा-मिलान का सवाल अपने आप हल रहता है। उसकी क़ीमत गति और परतों में चुकानी पड़ती है: रास्ते में मध्यस्थ बैंक आ सकते हैं, विदेशी मुद्रा में रूपांतरण होता है, और हर पड़ाव अपना समय लेता है। जिन पाठकों को सबसे कम आश्चर्य चाहिए, उनके लिए यह अक्सर सबसे शांत रास्ता होता है, भले ही सबसे तेज़ न हो।

कार्ड और ई-वॉलेट। कार्ड इस श्रेणी में सबसे पुराना रास्ता है और उसका एक बड़ा व्यावहारिक गुण है — पेआउट आम तौर पर उसी कार्ड पर लौटता है, इसलिए तरीक़ा-मिलान अपने आप बना रहता है। इसकी क़ीमत यह है कि जारीकर्ता की अपनी नीति बीच में आती है और विदेशी मुद्रा में लेन-देन पर उसकी अलग शर्तें लागू होती हैं। ई-वॉलेट एक अतिरिक्त पड़ाव जोड़ते हैं: पैसा वॉलेट में आने के बाद बैंक तक लाने का एक और क़दम बचता है, और वॉलेट खाता आपके ही नाम और दस्तावेज़ों से मेल खाना चाहिए।

क्रिप्टो फ़ंडिंग। क्रिप्टो इस बाज़ार में इसलिए दिखता है कि वह बैंकिंग परत को छोड़ देता है। उसकी अपनी क़ीमतें हैं और वे छोटी नहीं: नेटवर्क शुल्क, क़ीमत का उतार-चढ़ाव, और सबसे अहम — लेन-देन की अपरिवर्तनीयता। ग़लत पते या ग़लत नेटवर्क पर भेजा गया पैसा वापस नहीं आता, और उसमें किसी सपोर्ट टीम के पास करने को कुछ नहीं होता। जो पाठक क्रिप्टो नियमित रूप से इस्तेमाल नहीं करता, उसके लिए यह रास्ता सुविधा नहीं, एक नया जोखिम जोड़ता है।

इन चारों श्रेणियों में चुनाव करते समय एक ही कसौटी सबसे ऊपर रखिए: वह साधन आपके अपने नाम पर है या नहीं। बाक़ी सब (गति, शुल्क, सुविधा) उसके बाद आता है, क्योंकि नाम का मेल ही वह शर्त है जिस पर बाद में पेआउट टिकता है। इस कसौटी पर जो साधन खरा नहीं उतरता, वह पहले दिन कितना भी आसान क्यों न लगे, छह महीने बाद सबसे बड़ी अड़चन बनता है।

और एक बात, जो इस पूरे विषय पर एक बार कह देनी चाहिए: भारत से बाहर पैसा भेजने पर FEMA और उदारीकृत प्रेषण योजना से जुड़ी अनुपालन तथा कर-रिपोर्टिंग की ज़िम्मेदारी भेजने वाले की अपनी होती है, बैंक या मंच की नहीं। इसका पूरा ढाँचा FEMA और LRS वाले पन्ने पर खुला है।

हर फ़ंडिंग श्रेणी एक अलग परत जोड़ती है (बैंक की, जारीकर्ता की, वॉलेट की या नेटवर्क की) और वही परत तय करती है कि पैसा कहाँ अटकेगा।

UPI की हकीकत

UPI भारत में सबसे स्वाभाविक सवाल है और सबसे कम भरोसे से जवाब देने लायक भी, क्योंकि उसकी उपलब्धता विदेशी मर्चेंट के साथ स्थिर नहीं रहती।

UPI लोकप्रिय क्यों है। कारण सीधा है: यह तेज़ है, फ़ोन से चलता है, और घरेलू भुगतान में लगभग हर जगह मौजूद है। इसलिए जब कोई भारतीय पाठक किसी मंच में पैसा डालने की सोचता है, तो पहला सवाल यही बनता है। यह उम्मीद तर्कसंगत है; बस उसका जवाब उतना सीधा नहीं है।

उपलब्धता की सीमाएँ। हम यह नहीं कह सकते कि UPI इस मंच पर आपके लिए उपलब्ध होगा। यह सत्यापित नहीं है, यह अकाउंट-दर-अकाउंट और समय-दर-समय बदल सकता है, और घरेलू रेल का किसी विदेशी व्यापारी तक पहुँचना बीच के प्रोसेसर पर निर्भर करता है। इसीलिए इस पन्ने पर आपको कोई हैंडल, कोई ऐप और कोई बैंक नाम से नहीं मिलेगा, ऐसी सूची छापना पाठक को उस चीज़ का भरोसा देना होता जो हमारे पास है ही नहीं। जो जानकारी हर हाल में सही रहती है वह यह: कैशियर स्क्रीन पर उस क्षण जो विकल्प दिख रहे हैं, वही आपके लिए लागू हैं।

अगर कोई पन्ना, चैनल या "एजेंट" आपको यह भरोसा देता है कि उसके पास किसी ख़ास तरीक़े से पैसा डालने का चालू रास्ता है, तो वह भरोसा मंच से नहीं आ रहा, और उसकी क़ीमत आपका पैसा है।

थर्ड-पार्टी टॉप-अप का जोखिम। यहीं इस पूरे पन्ने की सबसे गंभीर चेतावनी है। जहाँ कोई सीधा रास्ता बंद दिखता है, वहाँ "टॉप-अप एजेंट" पैदा हो जाते हैं: लोग जो आपके बदले अकाउंट में पैसा डालने की पेशकश करते हैं, आम तौर पर किसी संदेश ऐप पर। इसमें दो अलग नुक़सान हैं। पहला, यह सादा ठगी का ढाँचा है: पैसा एजेंट को चला जाता है और अकाउंट में कुछ नहीं आता। दूसरा, अगर पैसा आ भी जाए तो वह किसी और के साधन से आया होता है, और पेआउट के समय तरीक़ा-मिलान टूट जाता है, यानी आपका ही पैसा बाहर निकालना मुश्किल हो जाता है। किसी और के कार्ड, वॉलेट या खाते से फ़ंडिंग करना, चाहे वह दोस्त या परिवार का ही क्यों न हो, इसी श्रेणी में आता है।

इस चेतावनी का एक और चेहरा है जो भारत में ख़ास तौर पर दिखता है, वे संदेश और पन्ने जो "डिपॉज़िट में मदद" की पेशकश करते हैं और उसके बदले आपके अकाउंट की जानकारी माँगते हैं। कोई भी असली भुगतान प्रक्रिया आपसे आपका पासवर्ड, कोई OTP या डिवाइस तक रिमोट एक्सेस नहीं माँगती। जहाँ यह माँगा जाए, वहाँ बातचीत उसी क्षण ख़त्म कर देनी चाहिए, चाहे सामने वाला कितना भी आधिकारिक दिखे।

इसका उलटा भी उतना ही सही है और यही सबसे उपयोगी नियम है: फ़ंडिंग हमेशा अपने ही नाम के साधन से, अपने ही डिवाइस से, और मंच के अपने कैशियर पन्ने से। इससे बाहर का हर रास्ता किसी न किसी दिन Pocket Option निकासी के समय सामने आ जाता है।

UPI का सही जवाब "हाँ" या "नहीं" नहीं, बल्कि "आज आपकी कैशियर स्क्रीन पर क्या दिख रहा है" है, और उसके बाहर का कोई रास्ता नहीं चुनना चाहिए।

ध्यान देने योग्य शुल्क

शुल्क एक जगह नहीं लगते; वे कई परतों में बँटे होते हैं और उनमें से ज़्यादातर मंच के नहीं, बीच में खड़े भुगतान ढाँचे के होते हैं।

प्रोवाइडर शुल्क। इस श्रेणी में मंच की कमाई का ढाँचा आम तौर पर पेआउट प्रतिशत होता है, न कि प्रति-सौदा कमीशन। लेकिन भुगतान की तरफ़ अलग शुल्क बन सकते हैं: भुगतान प्रोसेसर का अपना शुल्क, कार्ड जारीकर्ता की विदेशी लेन-देन नीति, वॉलेट का निकासी शुल्क, और कुछ स्थितियों में निष्क्रियता से जुड़ी शर्तें। इनमें से कोई भी आँकड़ा हम नहीं छापते, ये सत्यापित नहीं हैं और प्रदाता-दर-प्रदाता बदलते हैं। जो करना चाहिए वह यह है कि पहली बार पैसा डालने से पहले अपने बैंक या कार्ड जारीकर्ता की विदेशी लेन-देन संबंधी शर्तें एक बार पढ़ लें।

रूपांतरण संबंधी नोट। दूसरी परत मुद्रा की है। अकाउंट किसी विदेशी मुद्रा में चलता है जबकि आपका पैसा रुपये में है, इसलिए बीच में रूपांतरण होता है: और वह दो बार होता है, एक बार डालते समय और एक बार निकालते समय। इस रूपांतरण की दर और उस पर लगने वाला मार्जिन आपके भुगतान साधन पर निर्भर करता है, मंच पर नहीं। इसका सीधा नतीजा यह है कि बहुत छोटी-छोटी रकमें बार-बार डालना अनुपात में महँगा पड़ता है, क्योंकि हर बार एक निश्चित लागत जुड़ती है।

क्रिप्टो पर नेटवर्क शुल्क। तीसरी परत क्रिप्टो के साथ आती है। नेटवर्क शुल्क मंच तय नहीं करता; वह नेटवर्क की व्यस्तता पर निर्भर करता है और एक ही दिन में बदल सकता है। साथ ही, भेजने और जमा होने के बीच के समय में क़ीमत का उतार-चढ़ाव आपका अपना जोखिम है। यही दो कारण हैं जिनकी वजह से क्रिप्टो को "सस्ता रास्ता" मान लेना अक्सर ग़लत निकलता है।

इन तीनों परतों से निकलने वाली एक ही व्यावहारिक सलाह है: कुल लागत देखिए, किसी एक शुल्क को नहीं। असली सवाल यह है कि रुपये आपके खाते से निकलकर ट्रेडिंग बैलेंस तक पहुँचने में कितना घट गए, और वापसी में कितना। यह हिसाब पहली बार में ही निकाल लेना चाहिए, तभी आगे की तुलना का कोई अर्थ बनता है।

इसी वजह से आवृत्ति भी एक लागत है। हर बार जब पैसा डाला या निकाला जाता है, कोई न कोई निश्चित परत जुड़ती है: प्रोसेसर की, रूपांतरण की, या नेटवर्क की। बहुत छोटी रकमें हर हफ़्ते आगे-पीछे करने वाला पाठक इन्हीं परतों में एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा गँवा देता है, बिना यह महसूस किए कि नुक़सान ट्रेडिंग से नहीं, आवाजाही से हुआ। कम बार, सोच-समझकर की गई आवाजाही लगभग हमेशा सस्ती पड़ती है।

एक चीज़ जो शुल्क नहीं है पर उससे भी ज़्यादा महँगी पड़ती है, कोई सक्रिय ऑफ़र। बोनस की शर्तें स्वीकार करने पर बैलेंस एक अवधि तक बँध सकता है, और उस अवधि की क़ीमत किसी भी रूपांतरण मार्जिन से बड़ी हो सकती है। डिपॉज़िट स्क्रीन पर ऑफ़र का चेकबॉक्स इसीलिए ध्यान से देखने लायक है।

शुल्क का सही पैमाना कोई एक दर नहीं, बल्कि यह है कि रुपये से ट्रेडिंग बैलेंस तक और वापस आने में कुल कितना घटा।

पहले डिपॉज़िट के चरण

पहला डिपॉज़िट एक जाँच है, निवेश नहीं। उसका मक़सद रास्ता आज़माना है: यह देखना कि पैसा पहुँचता है, दिखता है, और वापस भी आ सकता है।

क्रम इस तरह रखिए, और हर चरण को छोड़ने के बजाय पूरा कीजिए:

  1. वेरिफ़िकेशन पहले। दस्तावेज़ पहले दिन जमा कर दीजिए, जब कोई जल्दी नहीं होती। Pocket Option KYC बाद में करना ही पेआउट के समय सबसे लंबी देरी बनता है।
  2. एक मेथड चुनना। कैशियर स्क्रीन खोलिए और उस क्षण दिख रहे विकल्पों में से वही चुनिए जो आपके अपने नाम पर है और आने वाले महीनों तक सक्रिय रहेगा।
  3. छोटी रकम से शुरू। पहली बार वही रकम डालिए जिसे खोने पर कुछ नहीं बदलता। इसका मक़सद ट्रेडिंग नहीं, रास्ता जाँचना है।
  4. क्रेडिट की पुष्टि। बैलेंस में रकम दिखने का इंतज़ार कीजिए और लेन-देन का रिकॉर्ड सहेज लीजिए: तारीख़, रकम, तरीक़ा और कोई संदर्भ संख्या।
  5. ऑफ़र की जाँच। देखिए कि कोई बोनस अपने आप लागू तो नहीं हुआ। अगर हुआ है और आप उसे नहीं चाहते, तो पहला ट्रेड करने से पहले उसे हटवा लीजिए।
  6. एक छोटी निकासी। यह आख़िरी और सबसे उपेक्षित चरण है। एक छोटा पेआउट पूरा रास्ता जाँच लेता है, बिना बड़ी रकम को अनिश्चितता में डाले।

अपने पेआउट से मिलाना। इन चरणों में सबसे ज़्यादा असर दूसरे और छठे का है, और वे आपस में जुड़े हैं। इस श्रेणी में पैसा आम तौर पर उसी साधन पर लौटता है जिससे वह आया था, इसलिए फ़ंडिंग का तरीक़ा चुनते समय ही आप अपनी निकासी का तरीक़ा भी चुन रहे होते हैं। जिस साधन के बंद हो जाने, बदल जाने या आपके नाम पर न होने की सम्भावना हो, वह पहली नज़र में सुविधाजनक लग सकता है और छह महीने बाद सबसे बड़ी अड़चन बन सकता है।

अगर आप मोबाइल से यह सब कर रहे हैं, तो सब कुछ मंच के अपने ऐप या ब्राउज़र से कीजिए। Pocket Option ऐप कहाँ से लेना चाहिए और नक़ली इंस्टॉलर कैसे पहचाने जाते हैं, यह अलग पन्ने का विषय है, पर भुगतान के संदर्भ में नियम एक ही है: भुगतान की जानकारी कभी किसी तीसरे ऐप, किसी लिंक या किसी संदेश में मत डालिए।

एक बात इन चरणों के बीच अक्सर छूट जाती है, पहला डिपॉज़िट करने के बाद कुछ दिन रुक जाना। पैसा बैलेंस में दिख गया, ऑफ़र की स्थिति साफ़ है, और छोटी निकासी हो चुकी है, इसके बाद ही यह सोचना चाहिए कि आगे कितना डालना है। जो पाठक पहले हफ़्ते में ही रकम बढ़ाता जाता है, वह उस जाँच का पूरा फ़ायदा गँवा देता है जिसके लिए उसने पहला डिपॉज़िट किया था। जल्दी सिर्फ़ उसी को होती है जो नतीजे का पीछा कर रहा हो, और इस उत्पाद में वह पीछा सबसे महँगा पड़ता है।

पहला डिपॉज़िट तब पूरा माना जाए जब उसके बाद एक छोटी निकासी भी हो चुकी हो, तभी रास्ता वाक़ई जाँचा गया।

समझदारी से डिपॉज़िट

डिपॉज़िट का आकार और उसकी आवृत्ति, दोनों उस पैसे से तय होनी चाहिए जिसे खोने पर आपकी योजनाएँ नहीं बदलतीं, किसी लक्ष्य से नहीं।

छोटे से शुरू करना। छोटी शुरुआत का तर्क कोई नैतिक उपदेश नहीं, एक तकनीकी बात है। जब तक आपने रास्ता जाँच नहीं लिया (डिपॉज़िट, वेरिफ़िकेशन, निकासी) तब तक आपके पास इस बात का कोई आधार नहीं कि बड़ी रकम कैसा बर्ताव करेगी। यही तर्क न्यूनतम डिपॉज़िट से शुरू करने के पीछे है। जो पाठक पहले दिन बड़ी रकम डालता है, वह जाँच का मौक़ा खो देता है और सारी अनिश्चितता एक साथ ले लेता है।

केवल फ़ालतू पूँजी। यह वाक्य अक्सर दोहराया जाता है और अक्सर अनसुना रह जाता है, इसलिए इसे ठोस रूप में रखते हैं। फ़ालतू पूँजी का मतलब है वह रकम जिसके पूरी तरह चले जाने पर आपका किराया, आपकी EMI, आपकी पढ़ाई या आपका आपातकालीन कोष अछूता रहे। उधार लेकर, क्रेडिट कार्ड से या किसी और के पैसे से इस श्रेणी में उतरना, तीनों ऐसे रास्ते हैं जिनका अंत लगभग हमेशा एक जैसा होता है। फिक्स्ड-टाइम ऑप्शन्स ऊँचे जोखिम वाली अल्पकालिक सट्टेबाज़ी है, पूँजी तेज़ी से और पूरी तरह जा सकती है, और इस श्रेणी में ज़्यादातर रिटेल अकाउंट घाटे में रहते हैं।

बोनस-शर्तों की जानकारी। डिपॉज़िट के क्षण एक और फ़ैसला छिपा होता है जिसे लोग फ़ैसला मानते ही नहीं, ऑफ़र लेना या न लेना। ऑफ़र स्वीकार करते ही टर्नओवर की शर्त और उसकी घड़ी शुरू हो जाती है, और कई ढाँचों में शर्त पूरी होने तक पूरे बैलेंस पर निकासी रोक लग सकती है। जिस पाठक को पैसा कुछ हफ़्तों में वापस चाहिए, उसके लिए ऑफ़र छोड़ देना आसान और सस्ता रास्ता है।

तीन आदतें जो लंबे समय में सबसे ज़्यादा काम आती हैं, और तीनों मुफ़्त हैं: हर लेन-देन का अपना रिकॉर्ड रखना; एक ही, अपने नाम वाले साधन पर टिके रहना; और डिपॉज़िट को कभी नुक़सान की भरपाई का जवाब न बनने देना। तीसरी आदत सबसे कठिन है, क्योंकि वह भावना के ख़िलाफ़ जाती है, और ठीक इसीलिए सबसे क़ीमती है।

आख़िर में एक सीधी बात, जो इस पन्ने की बाक़ी हर सलाह से ऊपर है। पैसा डालने का फ़ैसला किसी ऑफ़र, किसी घड़ी या किसी दूसरे व्यक्ति के भरोसे पर नहीं बनना चाहिए। जिस दिन आपको लगे कि आप डिपॉज़िट इसलिए कर रहे हैं क्योंकि कोई ऑफ़र ख़त्म हो रहा है, या क्योंकि किसी चैनल पर कोई मौक़ा बता रहा है, उस दिन सही क़दम रुक जाना है। मंच कल भी वहीं रहेगा; एक बार गया हुआ पैसा वापस नहीं आता।

फ़ंडिंग का सही आकार वही है जिसके चले जाने पर आपकी बाक़ी योजनाओं में कुछ न बदले, और नुक़सान के बाद उसे बढ़ाना सबसे महँगी प्रतिक्रिया है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या UPI से डिपॉज़िट किया जा सकता है?

हम यह नहीं कह सकते कि UPI आपके अकाउंट पर उपलब्ध होगा, यह सत्यापित नहीं है और विदेशी मर्चेंट के साथ घरेलू रेल की उपलब्धता बदलती रहती है। इसीलिए इस पन्ने पर कोई ऐप, बैंक या हैंडल नाम से नहीं गिनाया गया। जो विकल्प कैशियर स्क्रीन पर उस क्षण दिख रहे हैं, वही आपके लिए लागू हैं।

न्यूनतम डिपॉज़िट कितना है?

यह आँकड़ा हम नहीं छापते। ऑपरेटर के पन्नों पर यह गतिशील रूप से दिखता है, बदलता रहता है, और रुपये में इसका कोई स्थिर मान नहीं होता क्योंकि विनिमय दर के साथ वह हिलता है। पैसा डालने से ठीक पहले कैशियर स्क्रीन पर लाइव आँकड़ा देख लेना ही एकमात्र भरोसेमंद तरीक़ा है।

डिपॉज़िट पर कितना शुल्क लगता है?

कोई निश्चित आँकड़ा हम नहीं देते, क्योंकि शुल्क एक जगह नहीं लगते। भुगतान प्रोसेसर, कार्ड जारीकर्ता या वॉलेट के अपने शुल्क हो सकते हैं, मुद्रा रूपांतरण की अपनी परत होती है, और क्रिप्टो में नेटवर्क शुल्क अलग से बदलता रहता है। सही पैमाना यह है कि रुपये से ट्रेडिंग बैलेंस तक पहुँचने में कुल कितना घटा।

क्या कोई और मेरे लिए डिपॉज़िट कर सकता है?

ऐसा नहीं करना चाहिए। किसी "टॉप-अप एजेंट", दोस्त के कार्ड या किसी और के खाते से फ़ंडिंग करने पर पेआउट के समय तरीक़ा-मिलान टूट जाता है, क्योंकि पैसा जिस साधन से आया वह आपके नाम पर नहीं है। यह इस बाज़ार का जाना-पहचाना ठगी का ढाँचा भी है, जिसमें पैसा अक्सर एजेंट के पास ही रह जाता है।

डिपॉज़िट अकाउंट में दिखा क्यों नहीं?

सबसे आम कारण यह है कि लेन-देन बीच के भुगतान ढाँचे में अस्वीकार या वापस हो गया, भारतीय बैंक और कार्ड जारीकर्ता विदेशी ट्रेडिंग मर्चेंट से जुड़े भुगतान अक्सर रोकते हैं। दूसरा कारण नेटवर्क या प्रोसेसर की देरी होती है। अपने पास लेन-देन का रिकॉर्ड रखिए और उसी संदर्भ के साथ सपोर्ट से बात कीजिए।

क्या डिपॉज़िट का तरीक़ा निकासी को प्रभावित करता है?

हाँ, और यही इस पन्ने की सबसे काम की बात है। इस श्रेणी में पैसा आम तौर पर उसी साधन पर लौटाया जाता है जिससे वह आया था, इसलिए फ़ंडिंग का तरीक़ा चुनते समय आप अपनी निकासी का तरीक़ा भी चुन रहे होते हैं। ऐसा साधन चुनिए जो आपके अपने नाम पर हो और आने वाले महीनों तक सक्रिय रहे।